Thursday, 2 July 2009

क्षितिज

अपूर्व तुम्हारा मिलन है
तुम भरमाते
आह्लादित करते
और मन को
एक सहारा देते
कि मिलते हैं
पृथ्वी और आकाश।
तुम्हारा मिलन
एक असत्य सत्य है,
तुम्हें न दिन लिहाज
न रात का डर है
अपूर्व तुम्हारा मिलन है।

4 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा रचना!

M Verma said...

अपूर्व तुम्हारा मिलन है।
अच्छी अभिव्यक्ति --

ओम आर्य said...

मुझे लगता है अपूर्व...........रचना

‘नज़र’ said...

बहुत ही बढ़िया कविता है

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विज्ञान । HASH OUT SCIENCE